कर्नाटक चुनाव: वो 10 वजहें जिसकी वजह से BJP सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है

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बेंगलुरु. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी बहुमत के करीब पहुंच गई है। कांग्रेस 70 सीटोंके आसपास सिमटती नजर आ रही है। वहीं जेडीएस पिछली बार की तरह 40 के करीब होसकती है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को जीत का भरोसा था, वो पूरी ताकत झोंके हुए थी।करीब दो साल बाद को भी चुनाव प्रचार में उतारा गया। बावजूद इसके कांग्रेस हारकी तरफ है। ऐसे में वो वजहें बताते हैं जिसकी वजह से कांग्रेस के हाथ से सत्ता छिनती दिख रही है।बीजेपी की जीत के 10 कारण

1. मोदी का मैजिक
पूरा का पूरा कर्नाटक चुनाव तब बदल गया जब मोदी ने 1 मई से रैली करनी शुरू की। शुरू में तो उनकी 15 रैली थी, लेकिन उनकी रैलियों में बढ़ती भीड़ और मोदी के प्रभाव देखते हुए रैलियों की संख्या बढ़ाकर 21 कर दी गई। जिसका सीधा असर दिखा। मोदी ने 21 रैलियों में 115 सीटों को कवर किया। मोदी ने जहां-जहां रैली की उनमें से अधिकतर सीटों पर बीजेपी की जीत हुई। इसके अलावा इस चुनाव में पहली बार नमो एप के जरिए मोदी ने दो बार लोगों को संबोधित किया।
– इसके अलावा चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस के लिए पीपीपी का नया नारा दिया। उन्होंने गडग में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कर्नाटक में चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस घटकर पीपीपी कांग्रेस यानी पंजाब, पुडुचेरी और परिवार कांग्रेस रह जाएगी। इस नारे का कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ा पलटवार नहीं आया। ये नारा कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में कारगर साबित हुआ।

2. सिद्धारमैया सरकार से नाखुशी
कर्नाटक की जनता का जो फैसला सुनाया है उससे साफ पता चलता है कि जनता सिद्धारमैया सरकार से नाखुश थी। जिसका असर वोट के बड़े प्रतिशत में भी दिखा। 2013 के विधानसभा चुनाव में 70.23 प्रतिशत मतदान हुआ था। जो 2018 में बढ़कर 72 प्रतिशत तक पहुंच गया। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो वोटो का बढ़ा प्रतिशत कांग्रेस के खिलाफ गया।
– कर्नाटक चुनाव में लगातार कांग्रेस रेड्डी बंधुओं पर निशाना साधते हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाती रही है। लेकिन भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्यादा कारगर साबित नहीं हुआ। वहीं कर्नाटक में हर बार की तरह इस बार भी सत्तासीन पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल नहीं हुई।

3. का बूथ लेवल मैनेजमेंट
कर्नाटक चुनाव में मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने फिर से साबित कर दिया कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में रोकना मुश्किल है। जहां एक तरफ मोदी ने बड़ी से बड़ी रैलियों को संबोधित किया, वहीं हर बार की तरह अमित शाह ने बूथ लेवल तक का मैनेजमेंट संभाला। अमित शाह ने अपने सबसे सफल पन्ना प्रमुख फॉर्मूले को यूपी के बाद कर्नाटक में भी लागू किया। लेकिन इस बार थोड़ा बदलाव किया। शाह ने इस बार इसे दो हिस्सों में बांटा, पन्ना और अर्द्ध पन्ना। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमित शाह ने राज्य के 56,696 पोलिंग बूथों के 4.96 करोड़ मतदाताओं पर करीब 10 लाख अर्द्धपन्ना प्रमुख तैनात किए हैं। बता दें कि एक अर्द्ध पन्ना प्रमुख के पास 45 से 50 मतदाताओं की जिम्मेदारी होती है।

4. सिद्धारमैया का अहिंदा कार्ड फेल
सिद्धारमैया दलित कुरुबा जाति से ताल्लुक रखते हैं। जिसके चलते उन्हें उम्मीद थी कि अहिंदा वोट उन्हें मिलेगा। बता दें कि माइनॉरिटीज, बैकवर्ड क्लासेज और दलितों को कन्नड़ में अहिंदा कहा जाता है। लेकिन सिद्धारमैया का अहिंदा कार्ड फेल साबित हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने लगातार सिद्धारमैया के अहिंदा वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की। अमित साह ने सेट्रल कर्नाटक के दौरे किए। उन्होंने चित्रदुर्ग में दलित मठ शरना मधरा गुरु पीठ के महंत मधरा चेन्नैया स्‍वामीजी से मुलाकात की थी। अमित शाह का ये फॉर्मूला कारगर साबित हुआ। बीजेपी अहिंदा वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल हुई।

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5. लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने का विरोध
चुनावों की तारीखों से ठीक पहले कांग्रेस ने लिंगायत कार्ड खेला। समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर मंजूरी के लिए केंद्र के पास भेजा। लेकिन चुनाव के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस का ये दांव उलटा पड़ा। इससे लिंगायत तो खुश हुए लेकिन वोक्कालिंगाऔर बाकी जातियां कांग्रेस के खिलाफ हो गईं।

6. वोक्कालिंगाऔर बाकी जातियों की नाराजगी
कांग्रेस का लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव कांग्रेस के खिलाफ गया। राज्य में लिंगायतों की आबादी 17% से घटाकर 9% मानी गई। इस कदम से वोक्कालिगा समुदाय और लिंगायतों के एक धड़े वीराशैव में भी नाराजगी थी। इससे उनका झुकाव भाजपा की तरफ बढ़ा। कर्नाटक में 15 प्रतिशत तक वोक्कालिंगा हैं। इनकी दक्षिणी कर्नाटक में पकड़ है। यहां की 60 सीटों में से ज्यादातर पर इनका असर है। जेडीएस के एचडी देवगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी इसी समुदाय से है। जिससे कांग्रेस का वोट जेडीएस और बीजेपी में बट गया।

7. दस हजार वोटर कार्ड मिलना
कर्नाटक में चुनाव प्रचार के सेकंड लास्ट डे बेंगलुरु के राजेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से करीब दस हजार वोटर कार्ड मिले थे। जिसके बाद बीजेपी ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस के पास फर्जी वोटर कार्ड छापने की मशीन है। मुद्दा इतना गंभीर बन गया कि आधी रात को कांग्रेस और बीजेपी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस तक की। अगले दिन मोदी, अमित शाह यहां तक स्मृति ईरानी ने वोटर कार्ड को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा।

8. राहुल का बयान – मैं पीएम बनने के लिए तैयार हूं
कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो वो पीएम क्यों नहीं बन सकते हैं। राहुल के इस बयान के बाद बीजेपी ने पूरा मुद्दा राहुल के पीएम बनने पर डाइवर्ट कर दिया। हालांकि बाद में राहुल ने बार-बार ये कहा कि ये कर्नाटक का चुनाव है इसमें पीएम की बात नहीं करूंगा। लेकिन बीजेपी हर मंच पर राहुल के पीएम बनने के बयान को भुनाती रही।

9. येदियुरप्पा का कास्ट वोट मैनेजमेंट
येदियुरप्पा कास्ट वोट साधने में सफल साबित हुए। प्रदेश के 21 प्रतिशत लिंगायत येदियुरप्पा के साथ देते रहे हैं। लेकिन खतरा तब बढ़ गया था, जब सिद्धारमैया ने लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा। तब लगा कि कांग्रेस लिंगायत वोट बैंक को साध लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय को साधने में सफल साबित हुए।

10. जेडीएस और छोटी पार्टियों ने वोट काटे
2013 के विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 40 सीटें मिली थी। लेकिन इस बार उसकी सीटों में इजाफा होता दिख रहा है। जिसका सीधा असर कांग्रेस की घटी सीटों के रूप में दिख रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि जेडीएस बीजेपी की बी टीम है। दरअसल जेडीएस का वोट बैंक दलित है। इस बार वो बसपा से समझौता करके चुनाव लड़ी। जिसका साफ असर दिखा। दलित वोट बैंक कांग्रेस और जेडीएस में बंट गया। जिसका असर कांग्रेस की कम होती सीटों में साफ दिखता है।

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